शायरी महफ़िल · by Cedar Orbit · 2026-10-29
दफ़्तर से लौटते हुए मेट्रो में लिखा, पहला शेर है, सख़्ती से बताइए
रोज़ की भीड़ में खो जाने का डर नहीं मुझको
डर ये है कि किसी दिन खुद को ढूँढना भूल जाऊँ
बहर वगैरह का ज़्यादा ज्ञान नहीं है, बस दिल से निकला। उस्ताद लोग बताएँ कहाँ सुधार हो सकता है।
डर ये है कि किसी दिन खुद को ढूँढना भूल जाऊँ
बहर वगैरह का ज़्यादा ज्ञान नहीं है, बस दिल से निकला। उस्ताद लोग बताएँ कहाँ सुधार हो सकता है।
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