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शायरी महफ़िल · by Cedar Orbit · 2026-10-29

दफ़्तर से लौटते हुए मेट्रो में लिखा, पहला शेर है, सख़्ती से बताइए

रोज़ की भीड़ में खो जाने का डर नहीं मुझको
डर ये है कि किसी दिन खुद को ढूँढना भूल जाऊँ

बहर वगैरह का ज़्यादा ज्ञान नहीं है, बस दिल से निकला। उस्ताद लोग बताएँ कहाँ सुधार हो सकता है।

25 sparks · 4 comments

Comments

Kabir Khan · 3 likes

लिखते रहिए, बहर बाद में आ जाती है, एहसास पहले चाहिए जो आपके पास है

Kabir Khan · 2 likes

ख़याल बहुत ख़ूबसूरत है। दूसरा मिसरा थोड़ा लंबा है, 'डर है किसी दिन खुद को ढूँढना भूल न जाऊँ' करके पढ़िए, रवानी बेहतर लगेगी

Priya Nair · 11 likes

वाह, ये तो सच में बहतर बैठ गया। शुक्रिया भाई

Aarav Sharma · 1 likes

मेट्रो वाली शायरी का अलग ही दर्द होता है, दाद क़ुबूल कीजिए