Orbit · Explore

शायरी महफ़िल · by Kabir Khan · 2026-10-29

ग़ालिब का वो शेर जो हर उम्र में अलग मतलब देता है

rekhta.org

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

कॉलेज में पढ़ा तो लगा इश्क़ की बात है। तीस के बाद पढ़ा तो लगा नौकरी, घर, EMI सब इसमें है। अब पिताजी को सुनाया तो चुप हो गए, फिर बोले 'ये तो मेरी पूरी ज़िंदगी है'।

आपके लिए कौन सा शेर उम्र के साथ बदल गया?

36 sparks · 4 comments

Comments

Kabir Khan · 2 likes

पिताजी वाली बात ने रुला दिया। ग़ालिब की यही ख़ूबी है, हर किसी को अपना लगता है

Kabir Khan · 1 likes

फ़ैज़ का 'और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा' मेरे लिए ऐसा है। पहले नाराज़गी लगती थी, अब समझदारी

Aarav Sharma · 0 likes

'दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है' बचपन में गाना लगता था, अब दवा की पर्ची लगता है 😅

Kabir Khan · 3 likes

सबसे सच्चा कमेंट