शायरी महफ़िल · by Aarav Sharma · 2026-10-29
तरही मुशायरा: मिसरा 'चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं'
इस हफ़्ते का मिसरा-ए-तरह यही है। इसी ज़मीन पर अपना शेर या पूरी ग़ज़ल कमेंट में लिखिए। शुरुआत मैं करता हूँ:
जो लोग चले गए वो भी साथ रहते हैं
चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं
नए लोग बेझिझक आएँ, यहाँ कोई उस्ताद नहीं, सब सीख रहे हैं।
जो लोग चले गए वो भी साथ रहते हैं
चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं
नए लोग बेझिझक आएँ, यहाँ कोई उस्ताद नहीं, सब सीख रहे हैं।
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