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शायरी महफ़िल · by Aarav Sharma · 2026-10-29

तरही मुशायरा: मिसरा 'चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं'

इस हफ़्ते का मिसरा-ए-तरह यही है। इसी ज़मीन पर अपना शेर या पूरी ग़ज़ल कमेंट में लिखिए। शुरुआत मैं करता हूँ:

जो लोग चले गए वो भी साथ रहते हैं
चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं

नए लोग बेझिझक आएँ, यहाँ कोई उस्ताद नहीं, सब सीख रहे हैं।

20 sparks · 4 comments

Comments

Isha Menon · 11 likes

इस ज़मीन पर लिखना आसान नहीं है, सबने कमाल कर दिया

Kabir Khan · 10 likes

पिता की डाँट अब याद आए तो हँसता हूँ
चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं

बहर में है या नहीं पता नहीं, पर सच है

Ananya Rao · 5 likes

किताबें बंद हैं पर हर्फ़ बोलते हैं अब भी
चराग़ बुझते हुए भी रोशनी देते हैं

Aarav Sharma · 0 likes

वाह वाह, हर्फ़ बोलते हैं, क्या बात है